भारत के भू-आकृतिक विभाग पार्ट 1


भारत के भू-आकृतिक विभाग  - पार्ट 1 

संरचना एवं उच्चावच के आधार पर भारत को पाँच
 भू-आकृतिक विभागों में बाटा जा सकता है |

1. उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र

 भारत की उत्तरी सीमा पर विश्व की सबसे ऊँची एवं पूर्व-पश्चिम में फैली सबसे बड़ी पर्वतमाला है | यह विश्व की नवीनतम मोरदार पर्वत श्रेणी है | इस पर्वत श्रेणी के पश्चिमी भाग में नंगा पर्वत के निकट एवं पूर्वी भाग में मिशमी पहाड़ी या नामचा बरबा के निकट दो तीखे मोड़ हैयरपिन टर्न की भांति मिलते है | ये प्रायद्वीपीय पठारी भाग के उत्तर-पूर्व दबाव के कारण निर्मित हुई है |हिमालय की पर्वत श्रेणियाँ प्रायद्वीपीय पठार की और उत्तल एवं तिब्बत की और अवतल हो गई है | पश्चिम से पूर्व की और पर्वतीय भाग चौड़ाई घटती है किन्तु उचाई बढ़ती जाती है एवं ढाल भी तीव्र होता जाता है | उत्तर के पर्वतीय क्षेत्र को चार प्रमुख समांतर पर्वत श्रेणी क्षेत्रों में बांटा जा सकत है |

(1) ट्रांस हिमालय क्षेत्र

ट्रांस हिमालय

 इसके अंतर्गत काराकोरम , लद्दाख , जास्कर आदि पर्वत श्रेणीया आती है जिनका निर्माण हिमालय से भी पहले हो चुका था | ये मुख्यत : पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में मिलता है | K2 या गॉडविन ओस्टीन  काराकोरम श्रेणी की सर्वोच्च चोटी है जो की भारत की सबसे ऊंची चोटी भी है | ट्रांस हिमालय वृहत हिमालय से इंडो सांगपो शचर जोन के द्वारा अलग होती है |

(2) हिमाद्रि अथार्थ सर्वोच्च या वृहद हिमालय :

  यह हिमालय की सबसे ऊंची श्रेणी है | इसकी औसत ऊँचाई 6000 मी. है जबकि चौड़ाई 120 से 190 किमी. तक है | विश्व के प्राय: सभी महत्वपूर्ण शिखर इसी में स्तिथ है | एवेस्ट ( 8848 मी. ) , कंचनजंघा ( 8558 मी. ) , नंगा पर्वत , नन्दा देवी कामेट व नमचबरवा आदि इसके कुछ महत्वपूर्ण शिखर है | विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट  ( नेपाल ) इसी पर्वत श्रेणी में स्तिथ है | वृहद हिमालय लघु हिमालय से मेन सेंट्रल थ्रस्ट के द्वारा अलग होती है |

(3) हिमाचल श्रेणी अर्थात लघु या मध्य हिमालय:

 इसकी औसत चौड़ाई 80 से 100 किमी. एवं सामान्य ऊँचाई 3700 से 4500 मी. है | पिरपंजाल , धौलाधार , मसूरी , नागटीबा एवं महाभारत श्रेणियाँ इसी पर्वत श्रेणी का भाग है | वृहद व लघु हिमालय के मध्य कश्मीर घाटी , लाहुल – स्पीति , कुल्लु व कांगड़ा घाटियां मिलती है | यहाँ अल्पाइन चारागाह भी है जिनहे कश्मीर घाटी में मार्ग ( गुलमर्ग , सोनमर्ग ) तथा उत्तराखंड में वुग्याल या पयार कहा जाता है | लघु हिमालय अपने स्वास्थ्यवर्द्धक पर्यटक स्थलों के लिए विख्यात है उदाहरण के लिए शिमला , कुल्लु , मनाली , मसूरी , दार्जिलिंग आदि को लिया जा सकता है | लघु हिमालय शिवालिक से मेन बाउंड्री फॉल्ट के द्वारा अलग होता है |

(4) शिवालिक हिमालय:

 शिवालिक हिमालय
 शिवालिक हिमालय

 यह 10 से 50 किमी. चौड़ा और 900 – 1200 मी.ऊंचा है | अन्य दो श्रेणियों के विपरीत यह खंडित रूप में मिलता है | ये हिमालय के नवीनतम भाग है | शिवालिक और लघु हिमालय के बीच कई घाटियां है जैसे – काठमांडू घाटी पश्चिम में इन्हे दून या द्वार कहते है जैसे देहारादून और हरिद्वार | खेती की अच्छी संभावना होने के कारण इन घाटियों में कोगों का अच्छा बसाव है | शिवालिक के निचले भाग को तराई कहते है | यह दलदली और वनाच्छादित प्रदेश है | तराई से सटे दक्षिणी भाग में वृहद सीमावर्ती भ्रंश मिलता है जो कश्मीर से असम तक विस्तृत है |

हिमालय के उत्तर – पश्चिमी और उत्तर पूर्वी छोरों पर सिंधु व दिहांग गॉर्ज मिलते है | यहाँ प्रायद्वीपीय प्रखण्ड में निकली चट्टानी जिह्वाओं ( पश्चिम में अरावली पर्वत व पूर्व में मेघालय पठार ) के दबाव में एसे तीखे अक्षसंघीय मोड़ मिलते है जैसे चट्टानी समूह एक धुरी पर मोड़ दिए गाय हों | अंत: ये मोड़ हिमालय की अंतिम सीमा नहीं है वरन सिंधु – पार के पर्वत जैसे –सुलेमान , किरथर आदि और दिहांग गार्जपर के पर्वत जैसे – अराकानयोमा व



उत्तर – पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र आदि भी हिमालय के ही अंग है | हिमालय प्राय: धनुष की आकृति में है | तिब्बत के पठार की ओर इसका ढाल मंद है अंत: हिमालय के उत्तर में हिमनदों का जमाव अधिक मिलता है | जहां पश्चिमी हिमालय क्रमिक शृखलाओं में उचाई प्राप्त करता है वही पूर्वी हिमालय एकाएक काफी उचाई को प्राप्त कर लेता है | सिंधु , सतलज , ब्रांपुत्र आदि पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय क्षेत्र में गहरी घाटियां , गॉर्ज व कनियानों का निर्माण किया है | हिमालय के उत्थान के दौरान इन नदियों के द्वारा निरंतर कटाव से ये निर्मित हुई |

हिमालय क्षेत्र में काराकोरम , शिपकीला , नथुला , बोमडिला आदि अनेक दरें भी मिलते है | जम्मू – कश्मीर के लहाख क्षेत्र में स्तिथ काराकोरम दरा भारत का सबसे ऊँचा दर्रा ( 5654 मी. ) है | यहाँ से चीन को जाने वाले एक सड़क भी बनाई गई है | बुर्जील दरा जास्कर श्रेणी में स्तिथ है इसमे श्रीनगर से लेह का मार्ग गुजरात है | पिरपंजाल दरा से कुलगांव से कोठी जाने का मार्ग गुजरता है | जवाहर सुरंग भी इसि में स्तिथ है | शिपकीला दर्रा से मंडी से लेह जाने का मार्ग गुजरता है | थागा ला , माना , नीति व लीपुलेख दरा उत्तराखंड के कुमाऊँ श्रेणी में स्तिथ है , इसमे मानसरोवर झील व कैलाश घाटी का मार्ग गुजरता है | सिक्किम में स्तिथ नथुला व जोजेप्ला दर्रे का व्यापक सामरिक महत्त्व है | यहाँ से दार्जिलिंग व चुम्बी घाटी से होकर तिब्बत जाने का मार्ग है | 

बोमड़ीला दर्रे से तवांग घाटी होकर तिब्बत जाने का मार्ग जाता है जबकि यांगयाप दर्रे के पास ही ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है | यहाँ से चीन के लिए मार्ग भी जाता है | दिफू व पांगसाड दर्रा अरुणाचल प्रदेश में भारत – म्यांमार सीमा पर स्तिथ है | मणिपुर में स्तिथ तुजू दर्रा से इम्फाल से तामू और म्यांमार जाने का मार्ग गुजरता है |

विभिन्न नदियों ने हिमालय क्षेत्र को चार प्रमुख प्रकितीक भागों में एक दूसरे से पृथक कर रखा था :-


(1) कश्मीर या पंजाब हिमालय:

कश्मीर या पंजाब हिमालय
कश्मीर या पंजाब हिमालय

 सिंधु और सतलज के बीच 560  किमी. की दूरी में फैला हुआ है | यहाँ हिमालय क्रमिक रूप से उचाई प्राप्त करता है | जास्कर व पिरपंजाल श्रेणियाँ इसी के भाग है | हिमालय की चौड़ाई यहाँ सर्वाधिक है यह 250 से 400 किमी चौड़े क्षेत्र में विस्तृत है |

(2) कुमायूं हिमालय:

 यह सतलज और काली नदियों के बीच 320 किमी की दूरी में फैला हुआ है | यह उत्तराखंड क्षेत्र में विस्तृत है | नंदा देवी , कामेट , बद्रीनाथ , केदारनाथ , त्रिशूल आदि इसके प्रमुख शिखर है |

3.नेपाल हिमालय: 

यह काली और तीस्ता नदियों के बीच 800 किमी की दूरी में फैला हुआ है | यहाँ हिमालय की चौड़ाई अत्यंत कम है परंतु हिमालय के सर्वोच्च शिखर यहीं मिलते है , जैसे – एवरेस्ट , कंचनजंगा , मकालू आदि |

(4) असम हिमालय:

 यह तीस्ता तथा दिहंग नदियों के बीच 720 किमी की दूरी में फैला हुआ है | यहाँ हिमालय की ऊँचाई पुन: कम होने लगती है |

 प्रायद्वीपीय पठार:

  यह प्राचीन गोंडवाना भूमि का भाग है एवं त्रिभुजाकार आकृति में है | इसकी औसत ऊँचाई 600 से 900 मी है | अरावली , राजमहल और शिलांग की पहाड़ियाँ ( मेघालय की पहाड़ियाँ ) इस पठार की उत्तरी सीमा पर है | राजमहल – गारो वस्तुत: राजमहल व मेघालय की पहाड़ियाँ के बीच के भाग के जलोड़ निक्षेपों द्वारा उत्तर और पूर्व की और है जो सोन , चंबल और दामोदर नदियों की दिशा से स्पष्ट है | 
        
प्रायद्वीपीय पठार अनेक भागों मे विभक्त है | इसके अंतर्गत मालवा , बैतुल व बघेलखंड का पठार ( मध्य प्रदेश ) , बुंदेलखंड का पठार ( मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश ) ,दंडकारणय पठार ( ओड़ीशा ,छत्तीसगढ़ व आंध्र प्रदेश ) , तेलंगाना का पठार ( आंध्र प्रदेश ) , शिलांग का पठार ( मेघालय ) , हजारीबाघ व छोटानागपुर पठार ( झारखंड ) शामिल किए जा सकते है |

प्रायद्वीपीय पठार अत्यधिक घर्षित प्रचीन पठारी भाग है | यहाँ प्राचीन पर्वतमालाओं के अवशोष है एवं हिमाच्छादन के भी प्रमाण मिलते है | जहां हिमालय मे क्षैतिज संचलनों के उदाहरण है वही प्रायद्वीपीय पठारी भाग मे लंबवत संचालन के अनेक उदाहरण है | अरावली श्रेणी प्री कैम्ब्रियन काल की चट्टानों से निर्मित अत्यधिक प्राचीन व अवशिष्ट पर्वतमाला है | यह विच्छिन्न पहाड़ियों  की शृंखला के रूप मे गुजरात से दिल्ली तक विस्तृत है | इसकी चौड़ाई दक्षिण - पश्चिम से उत्तर - पूर्व की ओर क्रमश: घटती चली जाती है | अरावली की अधिकतम उचाई माउंट आबू के गुरु शिखर ( 1722 मी. ) मे मिलती है | विंध्याचल अत्यधिक पुराना व घर्षित 


मोड़कर परवटश्रेणी है | यह मालवा पठार के दक्षिण मे स्तिथ है एवं उत्तरी भारत को दक्षिण भारत से अलग करती है | इसकी औसत उचाई 700 से 1200 मीटर है | यह पश्चिम से पूर्व की और भारनेर , कैमुर , और पारसनाथ पहाड़ियों के रूप मे झारखंड तक लगभक 1050 किमी की लंबाई मे विस्तृत है

सतपुड़ा ब्लॉक पर्वत का उदाहरण है जिसके दोनों ओर नर्मदा और ताप्ती की प्रसिद्ध भू - भ्रंस घाटियां है | यह पर्वत श्रेणी विध्यांचल के दक्षिण मे एवं लगभग उसके समानान्तर स्तिथ है एवं पश्चिम में राजपिम्पला पहाड़ियाँ से प्रारम्भ होकर महादेव और मैकाल पहाड़ियों  के रूप मे छोटानागपुर पठार के पश्चिमी सीमा तक विस्तृत है | सतपुड़ा की सबसे अधिक उचाई महादेव पहाड़ी के पंचमढ़ी नगर के निकट धूपगढ़ ( 1350 मी ) मे मिलती है

मैकल पहाड़ी का सर्वोच्च शिखर अमरकंटक ( 1036 मी ) है | सोन व नर्मदा नदियों का उद्गम यही से होता है | मैकल से पूर्व की ओर जाने पर छोटानागपुर व राजमहल की पहाड़ियाँ भी मिलती है | मेघालय की गोरो - ख़ासी - जातीय भी वस्तुत: दक्षिणी प्रायद्वीप का ही अंग है | छोटनागपुर स्तिथ रांची का पठार समप्राय मैदान का सुंदर उदाहरण है | छोटनागपुर पठार को भारत का रूप भी कहा जाता है क्योंकि खनिज भंडार की दृष्टि से यह भारत का सबसे सम्पन्न प्रदेश है | शिलांग पठार छोटनागपुर पठार का ही अग्रभाग है |

पश्चिमी घाट : 

पश्चिमी घाट
पश्चिमी घाट 

ताप्ती के मुहाने से लेकर कन्याकुमारी अंतरीप तक 1600 किमी की लंबाई मे विस्तृत है | इसकी औसत ऊंचाई 1200 मीटर है | यह वास्तविक पर्वतश्रेणी नहीं है वरन  पठार का ही एक भ्रंश कगार है | यह उस भ्रंश का धोतक है जो अफ्रीका से भारत के अलग होते समय उत्पन्न हुआ था | पश्चिमी घाट से उत्तर मे गुजरात के सौराष्ट्र प्रदेश मे गिर की  पहाड़ियाँ मिलती है जो एशियाई सिंह के लिए विख्यात है |

पश्चिमी घाट को सहाद्री  भी कहा जाता है | ताप्ती से 16 N अक्षांश तक इस पर बैसाल्ट लावा का प्रवाह मिलता है | 16 N से पश्चिमी घाट के दक्षिण भाग मे स्तिथ नीलगिरी तक इसमे ग्रेनाइट तथा निस चट्टानें मिलती है | थालघाट , भोरघाट ,व पालघाट पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रे है जिनकी ऊंचाई क्रमश : 581 मी , 229 मी तथा 300 मी है | महाराष्ट्र मे उत्तरी सहयाद्रि  मे स्तिथ थलघाट दर्रे ( ऊंचाई 583 मी ) से मुंबई - नागपुर - कोलकाता रेलमार्ग व सड़क मार्ग इसी से गुजरते है

नीलगिरी व अन्नामलाई श्रेणियों  के बीच केरल मे स्तिथ पालघाट दर्रे से कालीकट - त्रिचूर – कोयंबटूर  - इडोर के रेल व सड़क मार्ग गुजरते है | उत्तरी सहाद्री की सबसे ऊँची चोटी काल्सुबाई है | महाबलेश्वर भी इसकी एक प्रमुख चोटी है जो कृष्णा नदी का उदगम स्थल है | नीलगिरी की अधिकतम ऊंचाई डोडाबेटी ( 2637 मी ) मे मिलती है | प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ऊतकमंदक या ऊटी नीलगिरी मे ही स्तिथ है | नीलगिरी के दक्षिण मे अन्नामलाई की पहाड़ियाँ है जिसकी सर्वाधिक ऊँची चोटी अनाइमुदी ( 2695 मी ) है | यह पश्चिमी घाट ( सहाद्री ) व संपूर्ण दक्षिण भारत का भी सर्वोच्च शिखर है | अनाईमुदी के निकट ही पालनी और इलामलय ( कोर्डमम पहाड़ियाँ ) है | शेनकोट्टा गैप कार्डेमम पहाड़ियों मे ही है | प्रसिद्ध पर्यटक स्थल कोडायकनाल पालनी पहाड़ी मे ही स्तिथ है | यह तमिलनाडू मे स्तिथ है |

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