भारत का संविधान part 2


1892 के आदिनियम की विशेषताएँ  part 2

इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त ( गैर – सरकारी )  सदस्यों की संख्या बधाई गई , हालांकि बहुमत सरकारी सदस्यों का ही रहता है |इसने विधान परिषदों के कार्यों में वृद्धि कर उन्हें बजट पर बहस करने और कार्यपालिका के प्रशनों का उत्तर का देने के लिए अधिकृत किया |इसमे केंद्रीय विधान परिषद और बंगाल चैंबर्स आफ कामर्स में गैर – सरकारी के सदस्यों के नामांकन के लिए वायसराय की शक्तियों का प्रावधान था | इसके अलावा प्रांतीय विधान परिषदों में गवर्नर को जिला परिषद , नगरपालिका , विश्वविध्यालय , व्यापार संघ , जमींदारों और चैम्बर आफ कामर्स की सिफ़ारिशों पर गैर – सरकारी सदस्यों को नियुक्त करने की शक्ति थी |

इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों दोनों में गैर – सरकारी सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक सीमित और परोक्ष रूप प्रयोक नहीं हुआ था | इसे निश्चित निकायों की सिफ़ारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया |

1909 के अधिनियम की विशेषताएँ

इस अधिनियम को मलरे – मिंटो सुधार के सुधार के नाम से भी जाना जाता है ( उस समय लार्ड मरले इंग्लैंड में भारत के राज्य सचिव थे और लार्ड मिंटो भारत में वायसराय थे ) |

1 इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधनपरिषदों के आकार में काफी वृद्धि की | केंद्रीय परिषद में इनकी संख्या 16 से 60 हो गई | प्रांतीय विधानपरिषदों में इनकी संख्या एक समान नहीं थी |

2 इसने केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी |

3 इसने दोनों स्तरों पर विधान परिषदों के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया | उदाहरण के तौर पर अनुपूरक प्रश्न पूछना , बजट पर संकल्प रखना आदि |

4 इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवनेर की कार्यपरिषद के साथ ए एसोसिएसन बनाने का प्रावधान किया गया | सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वाइसराय की कार्यपालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने | उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था |

इस अधिनियम ने प्रथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए संप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया | इसके अंतर्गत मुसलिम सदस्यों का चुनाव मुसलिम मतदाता ही कर सकते थे | इस प्रकार इस अधिनियम ने संप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लार्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना गया |इसने प्रेसीडेंसी कॉरपोरेशन , चैंबर्स आफ कामर्स , विश्वविधायलयों और जमींदारो के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया |

भारत शासन अधिनियम , 1919


20 अगस्त , 1917 को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार घोषित किया की उसका उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था |
भारत शासन अधिनियम , 1919



क्रमिक रूप से 1919 में भारत शासन अधिनियम बनाया गया , जो 1921 से लागू हुआ | इस कानून को मोटिन – चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है ( मोटिंग भारत के राज्य थे , जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वाइसराय थे )

अधिनियम की विशेषताएं

1 केंद्रीय और प्रांतीय विषयों की सूची की पहचान कर एवं उन्हे पृथक कर राज्यों पर केंद्रीय नियंत्रण कम किया गया | केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों को , अपनी सूचियों के विषयों पर विधान बनाने का अधिकार प्रदान किया गया | लेकिन सरकार का ढांचा केंद्रीय और एकात्मक ही बना रहा |

2 इसने प्रांतीय विषयों को पुनः दो भागों में विभक्त किया –हस्तांतरित और आरक्षित | हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर का शासन होता था और इस कार्य में वह उन मंत्रियों की सहायता लेता था , जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे | दूसरी ओर आरक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करता था , जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थी | शासन की इस दोहरी व्यवस्था को द्वैध शासन व्यवस्था कहा गया | हालांकि यह व्यवस्था काफी हद तक असफल ही रही |

3 इस अधिनियम ने पहली बार देश में द्वीसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारम्भ की | इस प्रकार भारतीय विधान परिषद के स्थान पर द्वीसदनीय व्यवस्था यानि राज्यसभा और लोकसभा का गठन किया गया | दोनों सदनों के बहुसंख्यक सदस्यों को प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से निर्वाचित किया जाता था |

4 इसके अनुसार , वायसराय की कार्यकारी परिषद के छह सदस्यों में से तीन सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था |

5 इसने सांप्रदायिक आधार पर सिखों , भारतीय ईसाइयों , आंग्ल-भारतियों और यूरोपियों के लिए भी पृथक निर्वाचन के सिद्धांत को विस्तारित कर दिया |

6 इस कानून ने संपति , कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया |

7 इस कानून ने लंदन में भारत के उच्चायुक्त के कार्याकल का सृजन किया और अब तक भारत सचिव द्वारा किए जा रहे कुछ कार्यो को उच्चायुक्त को स्थानांतरित कर दिया गया |

8 इससे एक लोक सेवा आयोग का गठन किया गया | अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया |

9 इसने पहली बार केंद्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया |

10 इसके अंतर्गत एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया , जिसका कार्य दस वर्ष बाद जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था |

साइमन आयोग

साइमन आयोग

ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1927 में नए संविधान में भारत की स्थिति का पता लगाने के लिए सर जॉन साइमन के नेतृत्व में सात सदस्यीय वैधानिक आयोग के गठन की घोषणा की | आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे , इसलिए सभी दलों ने इसका बहिष्कार किया | आयोग ने 1930 में अपनी रिपोर्ट पेश की तथा द्वैध शासन प्रणाली , राज्यों में सरकारों का विस्तार , ब्रिटिश भारत के संघ की स्थापना एवं सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखने आदि की सिफारिशें की | आयोग के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश सरकार ,ब्रिटिश भारत और भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों के साथ तीन गोलमेज सम्मेलन किए | इन सम्मेलनों में हुयी चर्चा के आधार पर , संवैधानिक सुधारों पर एक श्वेत-पत्र तैयार किया गया , जिसे विचार के लिए ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति के समक्ष रखा गया | इस समिति की सिफारिशों को भारत परिषद अधिनियम , 1935 में शामिल कर दिया गया |

सांप्रदायिक अवार्ड

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड ने अगस्त 1932 में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व पर एक योजना की घोषणा की | इसे कम्यूनल अवार्ड या सांप्रदायिक अवार्ड के नाम से जाना गया | अवार्ड ने न सिर्फ मुस्लिमों , सीख ,ईसाई , यूरोपियनों और आंगल भारतियों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था का विस्तार किया बल्कि इसे दलितों के लिए भी विस्तारित कर दिया गया | दलितों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था से गांधी बहुत व्यथित हुए और उन्होनें अवार्ड में संशोधन के लिए पुना की यरवाड़ा जेल में अनशन प्रारंभ कर दिया | अंतत : कांग्रेस नेताओं और दलित नेताओं के बीच एक समझौता हुआ , जिसे पुना समझौता के नाम से जाना गया | इसमें सयुंक्त हिन्दू निर्वाचन व्यवस्था को बनाए रखा गया और दलितों के लिए स्थान भी आरक्षित कर दिए गए |

भारत शासन अधिनियम , 1935

यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार के गठन में एक मिल का पत्थर साबित हुआ | यह एक लंबा और विस्तृत दस्तावेज़ था , जिसमे 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थीं |
भारत शासन अधिनियम , 1935

अधिनियम की विशेषताएं

1 इसने अखिल भारतीय संघ की स्थापना की , जिसमे राज्य और रियासतों को एक इकाई की तरह माना गया | अधिनियम ने केंद्र और इकाइयों के बीच तीन सूचियों-संघीय सूची , राज्य सूची और समवर्ती सूची के आधार पर शक्तियों का बंटवारा कर दिया | अवशिस्ट शक्तियां वायसराय को दे दी गई | हालांकि यह संघीय व्यवस्था कभी अस्तित्व में नहीं आई कियोंकि देसी रियासतों ने इसमे शामिल होने से इनकार कर दिया था |

2 इसने प्रान्तों में द्वैध शासन व्यवस्था समाप्त कर दी तथा प्रांतीय स्वायत्तता का शुभारंभ किया | राज्यों को अपने दायरे में रह कर स्वायत तरीके से तीन पृथक क्षेत्रों में शासन का अधिकार दिया गया | इसके अतिरिक्त अधिनियम ने राज्यों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की | यानि गवर्नर को राज्य विधान परिषदों के लिए उत्तरदायी मंत्रियों की सलाह पर काम करना आवश्यक था | यह व्यवस्था 1937 में शुरू की गई और 1939 में इसे समाप्त कर दिया गया |

3 इसने केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली का सुभारम्भ किया | परिणामतः संघीय विषयों को स्थानांतरित और आरक्षित विषयों में विभक्त करना पड़ा | हालांकि यह प्रावधान कभी लागू नहीं हो सका |

4 इसने 11 राज्यों में से छह में द्वीसदनीय व्यवस्था प्रारम्भ की | इस प्रकार , बंगाल , बंबई , मद्रास , बिहार , संयुक्त प्रांत और असम में द्वीसदनीय विधान परिषद और विधानसभा बन गई | हालांकि इन पर कई प्रकार के प्रतिबंध थे |

5 इसने दलित जातियों , महिलाओं और मजदूर वर्ग के लिए अलग से निर्वाचन की व्यवस्था कर सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था का विस्तार किया |

6 इसने भारत शासन अधिनियम , 1858 द्वारा स्थापित भारत परिषद को समाप्त कर दिया | इंग्लैंड में भारत सचिव को सलाहकारों की टिम मिल गई 

7.  इसने मत्ताधिकार का विस्तार किया | लगभग दस प्रतिशत जनसंख्या को मत का अधिकार मिल गया |

8.  इसके अंतर्गत देश की मुद्रा और साख पर नियंत्रण के लिये भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई |

9 इसने न केवल संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की बल्कि प्रांतीय सेवा आयोग और दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त सेवा आयोग की स्थापना भी की |

10.  इसके तहत 1937 में संघिय न्यायालय की स्थापना हुई |

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम , 1947


20.  फरवरी , 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने घोषणा की कि 30 जून , 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा | इसके बाद सत्ता उत्तरदायी भारतीय हाथों में सौप दी जाएगी | इस घोषणा पर मुसलिम लीग ने आंदोलन किया और भारत के विभाजन कि बात कही | 3 जून , 1947 को ब्रिटिश सरकार ने फिर स्पस्ट किया कि 1946 में गठित संविधान सभा द्वारा बनाया गया संविधान उन क्षेत्रों में लागू नहीं होगा , जो इसे स्वीकार नहीं करेंगे | उसी दिन 3 जून , 1947 को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन योजना कहा गया | इस योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर लीया | इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम , 1947 बनाकर उसे लागू कर दिया गया |
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम , 1947

अधिनियम की विशेषताएं

1.  इसने भारत में ब्रिटिश राज समाप्त कर 15 अगस्त , 1947 को इसे स्वतंत्र और संप्रभु रास्ट्र घोषित कर दिया |

2.  इसने भारत का विभाजन कर दो स्वतंत्र डोमिनियोनों-संप्रभु रास्ट्र भारत और पाकिस्तान का सृजन किया , जिन्हे ब्रिटिश रास्ट्र्मंडल से अलग होने की स्वतंत्रता थी |

3.  इसने वायसराय का पद समाप्त कर दिया और उसके स्थान पर दोनों डोमिनियन राज्यों में गवर्नर-जनरल पद का सृजन किया , जिसकी नियुक्ति नए राष्ट्र की कैबिनेट कि सिफारिश पर ब्रिटेन के ताज को करनी था | इन पर ब्रिटेन की सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होना था |

4.  इसने दोनों डोमिनियन राज्यों संविधान सभाओं को अपने देशों का संविधान बनाने और उसके लिए किसी भी देश के संविधान को अपनाने कि शक्ति दी | सभाओं को यह भी शक्ति थी कि वे किसी भी ब्रिटिश कानून को समाप्त करने के लिए कानून बना सकती थी , यहां तक कि उन्हें स्वतंत्रता अधिनियम को भी निरस्त करने का अधिकार था |

5.  इसने दोनों डोमिनियन राज्यों की संविधान सभाओं को यह शक्ति प्रदान की कि वे नए संविधान का निर्माण एवं कार्यान्वित होने तक अपने-अपने संबन्धित क्षेत्रों के लिए विधानसभा बना सकती थी | 15 अगस्त , 1947 के बाद ब्रिटिश संसद में पारित हुआ कोई भी अधिनियम दोनों डोमिनियन इस कानून को मानने के लिए कानून नहीं बना लेंगे |

6.  इस कानून ने ब्रिटेन में भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया | इसकी सभी शक्तियां रास्ट्र्मंडल मामलों के राज्य सचिव को स्थानांतरित कर दी गई |

7.  इसने 15 अगस्त , 1947 से भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश संप्रभुता की समाप्ति की भी घोषणा कि | इसके साथ ही आदिवासी क्षेत्र समझौता सम्बन्धों पर भी ब्रिटिश हस्तक्षेप समाप्त हो गया |

8.  इसने भारतीय रियासतों को यह स्वतंत्रता दी कि वे चाहे तो भारत डोमिनियन या पाकिस्तान डोमिनियन के साथ मिल सकती हैं या स्वतंत्र रह सकती हैं |

9.  इस अधिनियम ने नया संविधान बनने तक प्रत्येक डोमिनियन में शासन संचालित करने एवं भारत शासन अधिनियम , 1935 के तहत उनकी प्रांतीय सभाओं में सरकार चलाने कि व्यवस्था कि | हालांकि दोनों डोमिनियन राज्यों को इस कानून में सुधार करने का अधिकार था

10.  इसने ब्रिटिश शासक को विधेयकों पर मत्ताधिकार और उन्हें स्वीकृत करने के अधिकार से वंचित कर दिया | लेकिन ब्रिटीश शासक के नाम पर गवर्नर जनरल को किसी भी विधेयक को स्वीकार करने का अधिकार प्राप्त था |

11.  इसके अंतर्गत भारत के गवर्नर जनरल एवं प्रांतीय गवर्नरों को राज्यों का संवैधानिक प्रमुख नियुक्त किया गया | इन्हे सभी मामलों पर राज्यों कि मंत्रिपरिषद के परामर्श पर कार्य करना होता था |

12.  इसने शाही उपाधि से भारत का सम्राट शब्द समाप्त कर दिया |

13.  इसने भारत के राज्य सचिव द्वारा सिविल सेवा में नियुक्तियां करने और पदों में आरक्षण करने कि प्रणाली समाप्त कर दी | 15 अगस्त , 1947 से पूर्व के सिविल सेवा कर्मचारियों को वही सुविधाएं मिलती रहीं , जो उन्हें पहले से प्राप्त थी |
14-15 अगस्त , 1947 की मध्य रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया और समस्त शक्तियां दो नए स्वतंत्र डोमिनियनों-भारत और पाकिस्तान को स्थानांतरित कर दी गई | लॉर्ड माउंटबेटन नए डोमिनियन भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल बने | उन्होने जवाहरलाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई | 1946 में बनी संविधान सभआ को स्वतंत्र भारतीय डोमिनियन कि संसद के रूप में स्वीकार कर लिया गया |   

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